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*"अहिल्या की बेटियाँ"* *शून्य से शिखर तक का संकल्प*

रायगढ़ | महाराष्ट्र

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रायगढ़ जिले का छोटा परंतु एतिहासिक कस्बा पेण अपनी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की मिट्टी की मूर्तियों के लिए विश्व भर में जाना जाता है। लोग कहते हैं यहाँ के कलाकार बेजान मिट्टी में भी प्राण फूंक देते हैं। इसी पेण की गलियों में पिछले 30 वर्षों से एक और मूर्तिकला आकार ले रही है। जहाँ मिट्टी को नहीं,अपितु समाज की संघर्षशील महिलाओं के आत्मविश्वास को गढ़ा जा रहा है। यह गाथा है अहिल्या महिला मंडल की, जहाँ सेवा केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि सशक्तिकरण और जनकल्याण का अनूठा मार्ग है।बात 30 बरस पुरानी है,18 अक्टूबर 1996 को देवी अहिल्याबाई होल्कर की 200वीं पुण्यतिथि पर स्थापित अहिल्या मंडल ने मिट्टी को नहीं, अपितु समाज की संघर्षशील महिलाओं को गढ़ना शुरू किया। विश्व परिषद की जिला संयोजिका वासंती श्रीकांत देव, मंगला भोरे, रेखा साठे, सुषमा दातार, शिवांगी मंडल,अश्विनी जैसी समाज-शिल्पी बहनों के साथ मिलकर *अहिल्या मंडल* की स्थापना की। शुरुआत में जब ये मंडली जब महिलाएँ को विभिन्न प्रकल्पों से जोड़ने के लिए गाँवों में जाती थीं,तो गांव के लोग उन्हें स्वीकार नहीं करते थे।कई बार तो अपमान व तिरस्कार भी झेलना पड़ता। निरंतर प्रवास एवं सतत समर्पण ने सब के दिलों में जगह बनायी और महिलाएं स्वावलंबन, स्वास्थ्य और शिक्षा के विभिन्न आयामों से जुड़ने लगीं। इस पूरे कार्य का आधार बना 1984 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पुणे में गठित  महिला चेतना परिषद । यहां से जुड़ी महिलाओं ने देश का पहला ऐसा काम शुरू किया जो  महिलाओं के लिए महिलाओं के द्वारा और महिलाओं के लिए था।

अहिल्या मंडल* ने सबसे पहले बच्चियों की शिक्षा एवं वनवासी महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए कुछ प्रकल्प आरंभ किए।

माहेर (मायका) की ममता और सुकून हर बेटी के लिए असीमित होते हैं। मंडल ने इसी भाव से *माहेर* आयाम की शुरुआत की, जहाँ सुकून के साथ सम्मान भी मिलता है। समाज की वे बेटियाँ, जिनका मायका और ससुराल उनसे विमुख हो चुका है, उनके लिए यहाँ अनेक अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं।अचार, पापड़, बड़ी, मुरब्बा,शहद आदि के प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में सहायता प्रदान की जाती है। संस्था की सचिव शुभांगी दीदी बताती हैं कि यहाँ की रसोई में तैयार होने वाले अचार और मसालों की महक आज 5000 किलोग्राम के आँकड़े को पार कर चुकी है।

इसी परिधि में स्थापित *स्वयंसिद्धा* इन बहनों व बेटियों के लिए सिलाई केंद्रों में अनेक अवसर उपलब्ध कराता है। यहाँ की बनी कॉटन रजाई की आज वैश्विक पहचान है। यह महज़ एक उत्पाद नहीं है, यह उन 200 महिलाओं का परिश्रम है, जो दिन-रात सिलाई मशीन के पहिए के साथ अपने भाग्य का पहिया भी घुमा रही हैं। संगीता जैसी बहनें, जिन्होंने असमय अपने पति को खो दिया और बच्चों के लालन-पालन के लिए पैसों की कमी से जूझ रही थीं, यहाँ से सिलाई सीखकर आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। वे आज गर्व से कहती हैं कि यह सिलाई मशीन ही उनके जीवन की शक्ति है। वहीं दीपाली जैसी कुशल कारीगर, जिनके घर की आर्थिक नाव कोरोना की लहरों में डगमगा गई थी, आज हर महीने 25,000 रुपये कमाकर अपने घर को चलाने में सक्षम हो चुकी हैं।

संस्कृत को केवल एक भाषा के रूप में रूढ़िवादी परंपराओं तक सीमित रखने के विपरीत,अहिल्या महिला मंडल ने एक ऐसा ही क्रांतिकारी प्रयोग किया, वेदभाषा संस्कृत के प्रसार हेतु, जिसकी कल्पना भी कठिन थी *इंदिरा संस्कृत पाठशाला* के माध्यम से देववाणी को आम जन तक पहुँचाया। लेकिन सबसे अद्भुत था—महिला पंडितों की दीक्षा। आज 12 से अधिक महिलाएँ पूरे शास्त्रोक्त विधि से पौरोहित्य कार्य सफलता पूर्वक कर रही हैं।इसी तरह संस्था का *संजीवन आश्रम* उन बुजुर्गों का तीर्थ है, जिन्हें समाज में सेवा भाव और सद्भाव की आवश्यकता है। 55 बुजुर्ग यहाँ एक परिवार की तरह रहते हैं। लेकिन इस सेवागाथा का सबसे मर्मस्पर्शी अध्याय वह है, जब कोविड के भयावह दौर में अपनों ने भी संक्रमण के डर से बुजुर्गों के शवों को हाथ लगाने से मना कर दिया था। तब इस मंडल की महिलाओं ने अपनी जान की परवाह किए बिना आगे बढ़कर उन बुजुर्गों का अंतिम संस्कार किया था। वह दृश्य साक्षी था कि जब ममता कमान संभालती है, तो वह काल से भी नहीं डरती।

*अहिल्या महिला मंडल* का सर्वोत्तम योगदान है शिक्षा रूपी नींव से बेटियों के भविष्य की रचना करना। हैटवणे बाँध की पहाड़ियों से उतरकर जब वनवासी बच्चे मुक्ताई विद्या मंदिर पहुँचते हैं, तो उनके कदम शिक्षा को नई दिशा देते हैं। आज 210 बच्चे यहाँ से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। संस्था में बच्चों के पठन के लिए *विष्णुपंत भागवत* नाम से पुस्तकालय भी है।

वहीं *आनंदी छात्रावास* की 35 बेटियाँ, जो कभी घने जंगलों की बस्तियों में शिक्षा से वंचित थीं, आज डॉक्टर और इंजीनियर बनने की ओर अग्रसर हैं। कुछ बैंक में कार्यरत हैं, तो कुछ शिक्षिका बन ज्ञान का प्रकाश फैला रही हैं। यह छात्रावास केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उन सपनों का लॉन्चपैड है, जो भारत के भविष्य को निश्चित ही सुरक्षित करेंगे। मंडल की एक और उपलब्धि स्वास्थ्य के क्षेत्र में चल रहा *डॉ. घाटे चिकित्सा केंद्र* है। इस केंद्र ने 4000 से अधिक गरीब और जनजातीय लोगों को नया जीवन दिया है। हीमोग्लोबिन की जाँच से लेकर कैंसर की स्क्रीनिंग तक,मंडल ने यह सुनिश्चित किया कि अभाव के कारण किसी भी महिला की जान न जाए।

मरीज सामग्री केंद्र के माध्यम से व्हीलचेयर और बेड मुहैया कराना उन परिवारों के लिए देवकृपा के समान है, जिनके पास उन्हें खरीदने के लिए संसाधन नहीं हैं।

यहाँ वंचित नवजात शिशुओं के लिए नर्म सूती वस्त्र उपलब्ध कराए जाते हैं तथा इन वस्त्रों की बिक्री संस्था को लाभान्वित भी करती है।

स्वावलंबन की इस अनंत यात्रा से आम जनमानस की शक्तियों की पराकाष्ठा का प्रमाण मिलता है।

30 वर्षों का यह सफर *स्वयं-निर्मिति* से *स्वयं-पूर्णता* की ओर एक *स्वयं-प्रेरणा* है। 1000 से अधिक परिवारों को परिवार सलाह केंद्र के जरिए टूटने से बचाना, 5000 लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए तैयार करना और समाज की हर चुनौती को स्वीकार करना बस यही *अहिल्या महिला मंडल* का *मूल मंत्र* है।

आज पेण की ये महिलाएँ किसी की दया की पात्र नहीं हैं। वे स्वयं उद्यमी हैं, पंडित हैं, शिक्षक हैं और रक्षक हैं। वे साबित कर रही हैं कि यदि संकल्प अडिग हो और हृदय में अहिल्याजी जैसा त्याग हो, तो समाज की हर महिला के जीवन में खुशहाली की फसल लहलहा सकती है।

यह समाप्त होने वाला सफर नहीं है, यह तो हर उस महिला के साथ नए सिरे से शुरू होता है, जो पहली बार मंडल की दहलीज पर कदम रखती है। ऐसे संस्थान उन जाग्रत मनुष्यों के लिए प्रेरणा हैं, जो सामाजिक योगदान की ओर अपने कदम सदैव आगे बढ़ाना चाहते हैं।

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